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सोरायसिस का इलाज

अवलोकन

सोरायसिस जिसे आम भाषा में छाल रोग भी कहा जाता है त्वचा का एक ऐसा विकार है जो एक ऑटो इम्यून स्थिति होती है जिसकी वजह से त्वचा पर बड़े बड़े लाल धब्बे तथा चकत्ते नज़र आने लगते है l यह स्थिति उस समय होती है जब त्वचा की कोशिकाएं बहुत ही तेजी से बनने लगती है तथा त्वचा पर एक मोटी, सफेद अथवा लाल खुरदरी परत के रूप में जमने लग जाती हैं। ऑटो इम्यून की स्थिति उस स्थिति को कहा जाता है जब किसी वजह से व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक प्रणाली उनके शरीर की रक्षा करने की अपेक्षा स्वयं के शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं पर ही हमला करने लगती है। 

सोरायसिस एक आम रोग है जो किसी भी व्यक्ति को हो सकता है l यह रोग ज्यादातर व्यक्ति के घुटनों, कोहनी तथा स्कैल्प की त्वचा को प्रभावित करता है। सोरायसिस रोग के बढ़ने पर यह शरीर के सभी हिस्सों में फैलने लग जाता है जिससे पूरे शरीर पर बड़े बड़े धब्बे होने लगते हैं जिन्हें सोरायसिस वल्गैरिस के नाम से जाना जाता है। सोरायसिस एक असंक्रामक रोग है जिसमें व्यक्ति की त्वचा को छूने से फैलने के लक्षण नहीं होते हैं। सोरायसिस एक दीर्घकालिक रोग है जो एक लंबे समय तक व्यक्ति को पीड़ित कर सकता है तथा व्यक्ति के पूरे जीवनकाल में यह रोग उन्हें बार बार परेशान कर सकता है।

अनुसंधान

जैन के गोमूत्र चिकित्सा क्लिनिक का उद्देश्य प्राचीन आयुर्वेदिक ज्ञान को आधुनिक तकनीक के साथ एकीकृत करके एक सुखी और स्वस्थ जीवन बनाना है। हमारी चिकित्सा का अर्थ है आयुर्वेद सहित गोमूत्र व्यक्ति के तीन दोषों पर काम करता है- वात, पित्त और कफ। ये त्रि-ऊर्जा हमारे स्वास्थ्य को बनाए रखती हैं, इन दोषों में कोई भी असंतुलन, मानव स्वास्थ्य और बीमारी के लिए जिम्मेदार है। हमें यह कहते हुए खुशी हो रही है कि हमारे उपचार के तहत हमने इतने सारे सकारात्मक परिणाम देखे हैं। हमारे इलाज के बाद हजारों लोगों को कई बीमारियों से छुटकारा मिला।

हमारे मरीज न केवल अपनी बीमारी को खत्म करते हैं बल्कि हमेशा के लिए एक रोग मुक्त स्वस्थ जीवन जीते हैं। यही कारण है कि लोग हमारी चिकित्सा की ओर ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। आयुर्वेदिक उपचारों में हमारे वर्षों के शोध ने हमें अपनी कार्यप्रणाली को आगे बढ़ाने में मदद की है। हम पूरी दुनिया में एक स्वस्थ और खुशहाल समाज का निर्माण करने के लिए अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने का लक्ष्य रखते हैं।

गोमूत्र चिकित्सा द्वारा प्रभावी उपचार

गोमूत्र के उपचार के अनुसार, कुछ जड़ी-बूटियाँ शरीर के दोषों (वात, पित्त और कफ) का कायाकल्प कर सकती हैं और यदि यह दोष शरीर में असमान रूप से वितरित किये जाए, तो यह सोरायसिस का कारण बन सकता है। कुछ आयुर्वेदिक दवाओं में उनके उपचार के लिए कई लाभकारी तत्व होते हैं। यह शरीर के पाचन तंत्र को बेहतर बनाता है।

डर्मोसोल + लिक्विड ओरल

डेर्मोकर + कैप्सूल

पुरोडर्म+ मलहम

प्रमुख जड़ी-बूटियाँ जो उपचार को अधिक प्रभावी बनाती हैं

नीम

यह अपने जीवाणुरोधी गुणों के कारण सोरायसिस सहित विभिन्न प्रकार के त्वचा संक्रमणों का इलाज कर सकता है। नीम त्वचा को सभी कीटाणुओं और अतिरिक्त सीबम से सोरायसिस-प्रवण त्वचा को नष्ट करता है। नीम के पत्तों में बायो फ्लेवोनॉइड सहित एंटीऑक्सीडेंट भी होते हैं, जो त्वचा के रोम छिद्रों को रोकने और त्वचा की बनावट को बढ़ाने में मदद करते हैं, जो न केवल सोरायसिस को रोकने में बल्कि त्वचा को होने वाले नुकसान को भी ठीक करते हैं।

बावची

यह सोरायसिस जैसी त्वचा की समस्याओं के इलाज के लिए एक प्रभावी जड़ी बूटी है। बावची सोरायसिस का इलाज अपने जीवाणुरोधी, एंटीवायरल और एंटीफंगल गुणों के साथ करता है और मानव त्वचा के नुकसान को सामान्य करने में मदद करता है।

खदिर

खदिर अरिष्टम, खादिर का एक प्रमुख सूत्र है जो सोरायसिस सहित पुरानी त्वचा विकारों के सभी रूपों के लिए त्वचा की समस्याओं के लिए उपयोग किया जाता है और इसे एक आदर्श रक्त शोधक माना जाता है।

करंज

करंज अपने के वात-कफ संतुलन और रोपना (उपचार) गुण के कारण इस स्थिति को प्रबंधित करने में मदद करता है जो त्वचा को ठीक करने और सोरायसिस के लक्षणों को कम करने में मदद करता है।

चक्रमर्दा

चक्रमर्दा एक पौधा है जो सोरायसिस और अन्य त्वचा रोगों के इलाज के लिए उपयोगी है। इसके ग्लाइकोसाइड-समृद्ध पत्ते, जिसमें एलो-एमोडिन भी शामिल है, त्वचा रोगों के लिए उपयोगी हो सकता है।

चन्दन

यह सोरायसिस के भड़काऊ और रोग निरोधी विकृति को दूर करता है क्योंकि इसमें रोगाणुरोधी और एंटीसेप्टिक गुण होते हैं, जिससे यह सोरायसिस के इलाज के लिए एक हल्का और आसान तरीका है।

शुद्ध गंधक

शुद्ध गंधक रसायन जड़ी बूटी जीवाणुरोधी, एंटीवायरल और रोगाणुरोधी अनुप्रयोगों के लिए एक उत्कृष्ट आयुर्वेदिक एंटीबायोटिक है। इसमें अमीनो एसिड शामिल हैं जो ऊतकों, प्रोटीन, कोशिकाओं और एंटीबॉडी के उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह रक्त को शुद्ध करने और त्वचा की समस्याओं जैसे सोरायसिस से बचने में मदद करता है।

तुलसी

सोरायसिस के उपचार के लिए, तुलसी के बीज त्वचा रोगों में मदद कर सकते हैं। यह शरीर में गर्मी को कम करने में मदद करता है। तुलसी नियमित रूप से कोलेजन को स्रावित करने में मदद करती है, जो सामान्य टूट-फूट से क्षतिग्रस्त होने पर ताजा त्वचा और कोशिकाओं को बनाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली संपत्ति है।

कैशोर गुग्गुल

एक रक्त शोधक जिसमें एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं, किशोर गुग्गुल है। यह किसी भी प्रकार के एक्जिमा के उपचार में भी मदद करता है। किशोर गुग्गल में पित्त बढ़ने की संभावना कम होती है। यह अक्सर सूजन, त्वचा की जलन और दर्द को कम करने में प्रभावी होता है।

अनंतमूल

सभी प्रकार के त्वचा विकारों के लिए जैसे सोरायसिस और संक्रामक त्वचा रोग, अनंत मूल का उपयोग बाहरी और आंतरिक रूप से किया जा सकता है। इसकी रोगाणुरोधी गतिविधि के कारण, अनंत मूल जड़ बैक्टीरिया के संक्रमण से छुटकारा पाने में मदद करता है। अनंत मूल क्वाथ (काढ़ा) और इसके पाउडर में रक्त को शुद्ध करने का गुण होता है और इसका उपयोग विभिन्न त्वचा विकारों के इलाज के लिए किया जा सकता है।

मीठा इन्द्रजौ

मीठा इन्द्रजौ में एंटीसेप्टिक गुण होते हैं। इसका उपयोग परजीवी कृमियों को नष्ट करने के लिए कृमिनाशक एनोडेन के रूप में किया जाता है, जो सोरायसिस के लिए बेहद फायदेमंद है।

कपूर

कपूर त्वचा विकारों जैसे सोरायसिस और इससे जुड़े प्रभावों जैसे खुजली और सूजन के लिए एक एंटीडोट हो सकता है। कपूर के एंटीसेप्टिक और एंटी इंफ्लेमेटरी गुण इस बीमारी को भड़कने से रोक सकते हैं और त्वचा की सूजन और कोमलता का इलाज कर सकते हैं।

नारियल तेल

यह सोरायसिस के साथ मदद कर सकता है क्योंकि यह त्वचा में नमी लाने में मदद करता है। नारियल का तेल शुष्क त्वचा और बालों को मॉइस्चराइज करता है। तेल का इस्तेमाल खोपड़ी उपचार के रूप में सोरायसिस स्केल में मदद करने के लिए भी किया जा सकता है।

अजवाइन के फूल

अजवाइन के बीजों और फूलों में पोषण, कार्बोहाइड्रेट, एंजाइम और विटामिन अधिक होते हैं। अजवाइन बीज में थाइमोल नामक एक घटक एक प्रभावी कवकनाशी और कीटाणुनाशक के रूप में कार्य करता है जो सोरायसिस के उपचार में सहायक हो सकता है।

गोमय रस

सोरायसिस का मुकाबला करने के लिए, गोमूत्र जिसमें रोगाणुरोधी और एंटीऑक्सीडेंट प्रभाव होता है, का उपयोग किया जाता है। मूत्र घटकों की मुक्त कणों वाली गतिविधि एंटीऑक्सीडेंट कार्रवाई द्वारा सोरायसिस के इन घटकों से बचा जा सकता है।

गोजला

हम अपने गोमूत्र चिकित्सा में गोजला का उपयोग करते हैं, मूल रूप से इसका मतलब है कि हमारी दवा में मुख्य घटक गोमूत्र अर्क है। यह अर्क गाय की देसी नस्लों के मूत्र से बना है। गोजला के अपने फायदे हैं क्योंकि यह किसी भी प्रकार के संदूषण की संभावना से परे है। इसकी गुणवत्ता उच्च है एवं प्रचुर मात्रा में है। जब गोजला आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों के साथ मिलाया जाता है तो यह किसी भी बीमारी के इलाज के लिए अधिक प्रभावी हो जाता है और विशेष बीमारियों में अनुकूल परिणाम देता है। इस अर्क का अत्यधिक परीक्षण किया गया है और इसलिए यह अधिक विश्वसनीय और लाभदायक भी है।

जीवन की गुणवत्ता

गोमूत्र उपचार अच्छा स्वास्थ्य लाता है और दोषों को संतुलित रखता है। आज हमारे उपचार के परिणामस्वरूप लोग अपने स्वास्थ्य में लगातार सुधार कर रहे हैं। यह उनके दैनिक जीवन की गुणवत्ता में सुधार करता है। गोमूत्र के साथ-साथ आयुर्वेदिक दवाएं विभिन्न दुष्प्रभावों को कम करने के लिए एक पूरक चिकित्सा के रूप में काम कर सकती हैं जिन रोगियों को भारी खुराक, मानसिक दबाव, विकिरण और कीमोथेरपी के माध्यम से उपचार दिया जाता हैं। हम लोगों को मार्गदर्शन करते हैं कि यदि कोई रोग हो तो उस असाध्य बीमारी के साथ एक खुशहाल और तनाव मुक्त जीवन कैसे जियें। हजारों लोग हमारी थेरेपी लेने के बाद एक संतुलित जीवन जीते हैं और यह हमारे लिए एक बड़ी उपलब्धि है कि हम उन्हें एक ऐसा जीवन दें जिनके वे सपने देखते हैं।

जटिलता निवारण

आयुर्वेद में गोमूत्र की एक असाधारण स्थिति है जो सोरायसिस जैसी भयानक बीमारियों के लिए भी उचित है। हमारे वर्षों के कठिन काम से पता चलता है कि सोरायसिस के कई मुद्दे हमारे हर्बल उपचार का उपयोग करते हुए लगभग गायब हो जाते हैं। हमारे रोगियों को हृदय जोखिम, आंखों के स्वास्थ्य, खुजली और जलन दर्द, शरीर में हार्मोनल और रासायनिक परिवर्तनों को नियंत्रित करने और रोगी की प्रतिरक्षा प्रणाली में सुधार करने के लिए एक बड़ी राहत महसूस होती है जो अन्य सोरायसिस जटिलताओं के लिए अनुकूल रूप से काम करता है, इसके अलावा वे इस बीमारी के साथ ठीक से सो भी पाते हैं।

जीवन प्रत्याशा

अगर हम जीवन प्रत्याशा की बात करें तो गोमूत्र चिकित्सा अपने आप में एक बहुत बड़ी आशा है। कोई भी बीमारी, चाहे वह छोटे पैमाने पर हो या एक गंभीर चरण में, मानव शरीर पर नकारात्मक प्रभाव डालेगी और यह कई वर्षों तक मौजूद रहेगी, कभी-कभी जीवन भर भी। एक बार बीमारी की पहचान हो जाने के बाद, जीवन प्रत्याशा बहुत कम होने लगती है, लेकिन गोमूत्र चिकित्सा के साथ नहीं। हमारी प्राचीन चिकित्सा न केवल बीमारी से छुटकारा दिलाती है, बल्कि शरीर में किसी भी विषाक्त पदार्थों को छोड़े बिना व्यक्ति के जीवनकाल को बढ़ाती है और यह हमारा अंतिम लक्ष्य है।

दवा निर्भरता को कम करना

"सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत्", अर्थात सभी को हर्षित होने दें, सभी को रोग मुक्त होने दें, सभी को वास्तविकता देखने दें, किसी को कष्ट न होने दें। हम चाहते हैं कि इस कहावत को अपनाकर हमारी संस्कृति इसी तरह हो। हमारी चिकित्सा कुशल देखभाल प्रदान करके, प्रभावित रोगियों की जीवन प्रत्याशा को बढ़ाने और दवा निर्भरता को कम करके इसे पूरा करती है। इस नए युग में, हमारे उपचार में उपलब्ध किसी भी औषधीय समाधान की तुलना में अधिक लाभ और कम जोखिम हैं।

पुनरावृत्ति की संभावना को कम करना

व्यापक अभ्यास की तुलना में, हम रोग के अंतर्निहित कारण और कारणों पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो विशेष रूप से रोग के नियंत्रण पर निर्भर होने के बजाय रोग की पुनरावृत्ति की संभावना को बढ़ा सकते हैं। हम इस दृष्टिकोण को लागू करके और लोगों के जीवन को एक अलग रास्ता प्रदान करके प्रभावी रूप से पुनरावृत्ति की दर कम कर रहे हैं ताकि वे अपने जीवन को मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ तरीके से जी सकें।

सोरायसिस रोग के कारण 

इस रोग के एक से अधिक वह सभी कारण जिम्मेदार हो सकते हैं जो व्यक्ति की त्वचा पर अपना दुष्प्रभाव डालते हैं l ये कारण और जोखिम कारक कोई भी हो सकते हैं। उनमें से कुछ कारण इस प्रकार है - 

  • आनुवांशिकता

सोरायसिस रोग होने का एक मुख्य कारण व्यक्ति का पारिवारिक इतिहास हो सकता है जिसमें परिवार के किसी भी सदस्य को सोरायसिस की बीमारी हुई है तो यह संभव हो सकता है कि दूसरे सदस्य को भी आने वाले समय में इस तरह की बीमारी हो l आनुवांशिकी भागीदारी परिवार के कुछ सदस्यों को इस बीमारी से पीड़ित कर सकती है। 

  •  जीवन शैली 

व्यक्ति जो पर्याप्त आहार नहीं लेते हैं तथा पौष्टिकता की कमी वाले आहार, अधिक खटाई तथा फास्ट फूड आदि का ज्यादा सेवन करते हैं अथवा वह व्यक्ति जो अत्यधिक धूम्रपान, शराब आदि का सेवन करते हैं उन्हें सोरायसिस रोग होने की संभावना हो सकती है l 

  • प्रतिरक्षा प्रणाली 

प्रत्येक व्यक्ति की प्रतिरक्षा प्रणाली उनके शरीर की वायरस, बैक्टीरिया तथा रोगों से रक्षा करती है l परंतु जब यही प्रतिरक्षा प्रणाली शरीर पर विपरीत असर डालने लगती है, शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं को नष्ट करने लगती है तो यह स्थिति शरीर के अंगों को प्रभावित करने लगती है तथा कई ऑटो इम्यून डिजीज को उत्पन्न करने के साथ सोरायसिस जैसे रोग को भी पैदा करती है। 

  • जलवायु 

ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की तेज, झुलसाती किरणों के लगातार संपर्क में आने तथा सर्दियों में त्वचा के अत्यधिक शुष्क हो जाने जैसे मौसम परिवर्तनों से व्यक्ति की त्वचा प्रभावित होती रहती है जो सोरायसिस होने का जोखिम बढ़ा सकती है। 

  • दवाइयां

कुछ दर्द नाशक दवाइयों का उपयोग भी सोरायसिस रोग को उत्पन्न करने के जिम्मेदार माने जा सकते हैं l आम तौर पर ये दवाइयाँ लिथियम, एंटी-मलेरियल मेडिकेशन, हाई ब्लड प्रेशर मेडिकेशन आदि में ली जाने वाली दवाइयां होती है जो इस तरह के रोग का कारण बन सकती है। 

  • संक्रमण 

किसी भी तरह का बैक्टीरियल व वायरल इन्फेक्शन जैसे कि डेंगू का बुखार, मलेरिया आदि से प्रभावित होकर भी इस रोग के पनपने की आशंका रहती है। 

  • तनाव

व्यक्ति की अत्यधिक तनाव की स्थिति भी उसे इस तरह के रोग से ग्रसित कर सकती है। व्यक्ति के मानसिक तनाव के कारण उसकी पर्याप्त नींद, संतुलित आहार लेने जैसी स्वास्थ्यवर्धक रोजमर्रा की चीजों में परिवर्तन आने लगते है जो उनके शरीर के साथ उनकी त्वचा को भी प्रभावित करते है तथा ऐसे रोगों की उत्पत्ति का कारण बनते हैं। 

 

सोरायसिस रोग के निवारण 

कुछ जरूरी बदलावों को हम अपनी जीवन शैली में अपना कर सोरायसिस जैसे रोग की संभावना को काफी हद तक रोक सकते हैं जैसे कि - 

  • व्यक्ति को संतुलित और पर्याप्त आहार लेना चाहिए तथा बाहर का खाना खाने जैसी आदत को कम करना चाहिए l
  • व्यक्ति को धूम्रपान तथा एल्कोहल जैसी बुरी आदतों को बिल्कुल त्याग देना  चाहिए l
  • व्यक्ति को अपने जीवन में तनाव ग्रस्त होने से बचना चाहिये तथा पर्याप्त नींद लेनी चाहिए l
  • जलवायु में होने वाले परिवर्तनों तथा मौसमी बदलाव के अनुरूप व्यक्ति को अपनी त्वचा की अच्छे से देखभाल करनी चाहिए l
  • व्यक्ति को धूप में अधिक जाने से बचना चाहिए तथा बाहर निकलते समय त्वचा को अच्छे से ढक कर रखना चाहिए l
  • व्यक्ति को चिकित्सीय सलाह पर ही उन दवाइयों का करना चाहिए जो इस तरह के रोग को गंभीर की समस्या पैदा कर सकती है। 
  • व्यक्ति को अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने का पूरा ख्याल रखना चाहिए। 
  • त्वचा पर होने वाली एलर्जी तथा बार बार होने वाले संक्रमण से व्यक्ति को बचना चाहिए तथा इन स्थितियों को ज्यादा बढ़ने नहीं दिया जाना चाहिए।
  • व्यक्ति को त्वचा की नमी की बनाए रखने के लिए नित्य त्वचा लोशन, तेल आदि लगाना चाहिए तथा सर्दियों में खासकर त्वचा को अत्यधिक शुष्क होने से बचाना चाहिए l

सोरायसिस रोग के लक्षण 

इस रोग के लक्षण त्वचा पर निम्नलिखित रूपों में उभर कर आते है - 

  • व्यक्ति की त्वचा पर सूखी सफेद, लाल तथा खुरदरी पपड़ियाँ व परत बन जाती हैं I
  • सोरायसिस से प्रभावित त्वचा पर अत्यधिक खुजली होने लगती है। 
  • व्यक्ति के स्कैल्प पर सफेद सिल्वरी परतें जमने लग जाती है तथा रूसी के रूप में परतें टूटकर निकलती है l
  • व्यक्ति की त्वचा पर बड़े बड़े लाल चकत्ते, धब्बे, पैचेज तथा रैश हो जाते हैं l 
  • व्यक्ति की प्रभावित त्वचा पर जलन, दर्द, सूजन तथा चुभन जैसी अनुभूतियाँ होने लगती है l
  • व्यक्ति के नाखूनों की ऊपरी त्वचा शुष्क होकर फटने लगती है तथा नाखूनों में छोटे छोटे गड्ढे बनने लगते हैं। 
  • व्यक्ति की त्वचा इतनी ज्यादा शुष्क हो जाती है कि थोड़ी सी भी खुरचन से त्वचा फटने लगती है तथा त्वचा में से खून निकलने लगता है l

 

सोरायसिस रोग के प्रकार 

  • प्लाक सोरायसिस 

सोरायसिस का यह प्रकार बहुत ही आम है जो ज्यादातर लोगों में देखने को मिलता है। इस सोरायसिस से त्वचा पर मोटे लाल पैचेज होने लगते हैं जो एक सफेद परत से घिरी हुई होती है l ज्यादातर ये स्थिति व्यक्ति के स्कैल्प को प्रभावित करती है साथ ही पीठ, कोहनी तथा घुटनों के जोड़ पर भी होती है। 

  • ग्यूटेट्स सोरायसिस 

 यह सोरायसिस त्वचा पर छोटे लाल डॉट्स अथवा धब्बों के रूप में उभर कर आता है जो कि पूरे शरीर में फैल जाते है तथा इन दानों में खुजली और जलन होती है। कभी कभी इस रोग से ग्रसित व्यक्ति को बुखार आने लगता है तथा वह कमजोरी महसूस करने लगता है l 

  • इनवर्स सोरायसिस 

त्वचा की सिलवटों वाले हिस्सों पर इनवर्स सोरायसिस होता है जो ज्यादातर बाहों, स्तनों के ठीक नीचे के हिस्से तथा निजी अंगों की सिलवटों वाली त्वचा पर लाल धब्बों के रूप में नज़र आते हैं, सफेद परतें उतरती है तथा त्वचा पर खुजली, जलन आदि होती है। 

  • पुस्टूलर सोरायसिस 

यह प्लाक सोरायसिस की ठीक विपरीत स्थिति होती है। इस सोरायसिस से त्वचा पर सफेद दाने जिनमे मवाद भरा होता हैं जो एक लाल परत से घिरी हुई होती है। यह सोरायसिस अधिकतर हथेलियों, उंगलियों की ऊपरी त्वचा, तलवों पर होता है जहां व्यक्ति को खुजली के साथ दर्द भी होता है। 

  • नेल सोरायसिस

यह रोग व्यक्ति के नाखून तथा नाखूनों की त्वचा को प्रभावित करता है l इस रोग से ग्रसित व्यक्ति के नाखुन ढीले, उभरे हुए से दिखाई पड़ने लगते हैं तथा नाखुन के त्वचा से  उखड़ने  जैसी स्थिति पैदा हो जाती हैl  नाखुन का रंग पीला तथा भूरा हो जाता है तथा नाखूनों में कुछ भराव सा महसूस होता है l

  • एरिथ्रोडर्मिक सोरायसिस 

सोरायसिस का यह एक बहुत ही गम्भीर प्रकार होता है जिसमे व्यक्ति के पूरा शरीर की त्वचा जली हुई सी, सन बर्न की तरह दिखाई देती है जिसमें त्वचा जलने के बाद उतरने वाली पपड़ीदार लाल चमकीली त्वचा के भाँति दिखाई पड़ती है l इस रोग में व्यक्ति को बहुत अधिक खुजली, जलन व दर्द महसूस होता है तथा उसे बुखार भी होने लगता है।

सोरायसिस की जटिलताएंँ

व्यक्ति को त्वचा की एलर्जी होने पर निम्न जटिलताओं का सामना करना पड़ता है - 

  • गंभीर सोरायसिस से मृत्यु का खतरा हो सकता है।
  • यह संयुक्त क्षति का कारण बन सकता है जिसे सोरियाटिक गठिया के रूप में जाना जाता है जिससे हृदय के दौरे सहित हृदय संबंधी जोखिम अधिक हो सकते है।
  • यह रोग व्यक्ति की आंखों के स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकता है।
  • त्वचा पर असामान्य सी चुभन,  खुजली व जलन व्यक्ति को पूरे दिन परेशान करती है। 
  • व्यक्ति की त्वचा के संक्रमित होने का डर रहता है l
  • व्यक्ति असहज महसूस करने लगता है तथा उसका चिड़चिड़ापन बढ़ने लगता   है l
  • एलर्जी की वजह से व्यक्ति ठीक से सो नहीं पाता है, नींद की कमी रहती है तथा व्यक्ति बैचेन रहने लगता है l
  • व्यक्ति के आत्मविश्वास में कमी आने लगती है l

मान्यताएं

क्या कह रहे हैं मरीज

"विभिन्न अध्ययन किए गए हैं जहां जैन गाय मूत्र चिकित्सा ने रोगियों में महत्वपूर्ण सुधार दिखाया है।"