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संक्रामक रोग का इलाज

अवलोकन

अस्वस्थ होना या शरीर में कुछ ऐसे बदलाव होना जो हमारे लिए कई तरह की समस्याएं खड़ी करते है तथा जिन्हें ठीक करने के लिए हमे चिकित्सीय उपचार की जररूत पड़ती है ये सभी स्थितियां शरीर में होने वाले रोग की ओर इंगित करती है जो चिकित्साविज्ञान की मूलभूत संकल्पना होती है I जब किसी कमी की वजह से हमारा शरीर तथा शरीर के अंग अपना काम ठीक तरह से करने में असमर्थ रहते है तो ये कमी ही हमारे शरीर की बीमारी कहलाती है I इन बीमारियों के पीछे कई भीतरी और बाहरी कारक ज़िम्मेदार होते है जो हमे बीमार करते है I इन बीमारियों के होने की कई अलग वजह होती है जिसके कारण हम इन्हें अलग अलग रूपों में परिभाषित करते है I कुछ ऐसे ही रोग प्रायः एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में आपसी सम्पर्क के जरिये फैलते है और उन्हें बीमार करते है I इस तरह के रोगों को आम भाषा में संक्रामक रोग के नाम से परिभाषित किया जाता है I आज की दुनिया में यह संक्रामक रोग एक विशेष रूप से गंभीर चिंता का विषय बन चुके है ख़ासकर एक लम्बे समय से चल रहे कोरोना वायरस की वजह से I यह संक्रामक रोग हमारे लिए कितने गंभीर होते है इस बात का अंदाजा हम कोविड - 19 से लगा सकते है जिसने दुनिया की आधी आबादी से ऊपर की आबादी को अपनी चपेट में ले रखा था I

प्रोटोज़ोआ, यीस्ट, बैक्टीरिया, वायरस, फंगस, कवक और सूक्ष्म परजीवी नाम के ये सभी रोगाणु संक्रामक रोग के जनक माने जाते है जो किसी व्यक्ति के शरीर में पहुंचकर पनपते है, अपनी संख्या को तेजी से बढ़ाते है और फिर एक इंसानी शरीर से दूसरे इंसानी शरीर में पहुँच जाते है और उन्हें बीमार करते है I संक्रामक रोग की यह प्रक्रिया एक बहुत बड़ी चेन बनाकर मजबूती से चलती रहती है और इस तरह लोगो को अपनी चपेट में लेती है I ये रोग व्यक्तियों के जरिये प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष संपर्क, विशिष्ट तत्वों से दूषित पदार्थों के सेवन, रोगोत्पादक तथा आपसी निकट सम्पर्क से फैलते है तथा उन्हें संक्रमित करते है I हालांकि कुछ रोग रोगाणु जनित जरुर होते है पर वो व्यक्ति से दूसरे में नहीं फैलते I ऐसे रोग बाहरी कारकों जैसे कि बैक्टीरिया, वायरस कुछ कीड़े या अन्य जानवरों के जरिये लोगो को संक्रमित करते है I इंसानी जीवन के लिए यह रोग बहुत ख़तरनाक साबित होते है क्योकि आधी से ज़्यादा बीमारियाँ और मौतें इन्ही संक्रामक रोगों से जुड़ी हुई होती हैं।

अनुसंधान

जैन के गोमूत्र चिकित्सा क्लिनिक का उद्देश्य प्राचीन आयुर्वेदिक ज्ञान को आधुनिक तकनीक के साथ एकीकृत करके एक सुखी और स्वस्थ जीवन बनाना है। हमारी चिकित्सा का अर्थ है आयुर्वेद सहित गोमूत्र व्यक्ति के तीन दोषों पर काम करता है- वात, पित्त और कफ। ये त्रि-ऊर्जा हमारे स्वास्थ्य को बनाए रखती हैं, इन दोषों में कोई भी असंतुलन, मानव स्वास्थ्य और बीमारी के लिए जिम्मेदार है। हमें यह कहते हुए खुशी हो रही है कि हमारे उपचार के तहत हमने इतने सारे सकारात्मक परिणाम देखे हैं। हमारे इलाज के बाद हजारों लोगों को कई बीमारियों से छुटकारा मिला।

हमारे मरीज न केवल अपनी बीमारी को खत्म करते हैं बल्कि हमेशा के लिए एक रोग मुक्त स्वस्थ जीवन जीते हैं। यही कारण है कि लोग हमारी चिकित्सा की ओर ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। आयुर्वेदिक उपचारों में हमारे वर्षों के शोध ने हमें अपनी कार्यप्रणाली को आगे बढ़ाने में मदद की है। हम पूरी दुनिया में एक स्वस्थ और खुशहाल समाज का निर्माण करने के लिए अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने का लक्ष्य रखते हैं।

गोमूत्र चिकित्सा द्वारा प्रभावी उपचार

गोमूत्र के उपचार के अनुसार, कुछ जड़ी-बूटियाँ शरीर के दोषों (वात, पित्त और कफ) का कायाकल्प कर सकती हैं और यदि यह दोष शरीर में असमान रूप से वितरित किये जाए, तो यह संक्रामक रोग का कारण बन सकता है। कुछ आयुर्वेदिक दवाओं में उनके उपचार के लिए कई लाभकारी तत्व होते हैं। यह शरीर के पाचन तंत्र को बेहतर बनाता है।

जीवन की गुणवत्ता

गोमूत्र उपचार अच्छा स्वास्थ्य लाता है और दोषों को संतुलित रखता है। आज हमारे उपचार के परिणामस्वरूप लोग अपने स्वास्थ्य में लगातार सुधार कर रहे हैं। यह उनके दैनिक जीवन की गुणवत्ता में सुधार करता है। गोमूत्र के साथ-साथ आयुर्वेदिक दवाएं विभिन्न दुष्प्रभावों को कम करने के लिए एक पूरक चिकित्सा के रूप में काम कर सकती हैं जिन रोगियों को भारी खुराक, मानसिक दबाव, विकिरण और कीमोथेरपी के माध्यम से उपचार दिया जाता हैं। हम लोगों को मार्गदर्शन करते हैं कि यदि कोई रोग हो तो उस असाध्य बीमारी के साथ एक खुशहाल और तनाव मुक्त जीवन कैसे जियें। हजारों लोग हमारी थेरेपी लेने के बाद एक संतुलित जीवन जीते हैं और यह हमारे लिए एक बड़ी उपलब्धि है कि हम उन्हें एक ऐसा जीवन दें जिनके वे सपने देखते हैं।

जटिलता निवारण

आयुर्वेद में गोमूत्र की एक असाधारण स्थिति है जो संक्रामक रोग जैसी भयानक बीमारियों के लिए भी उचित है। हमारे वर्षों के कठिन काम से पता चलता है कि संक्रामक रोग के कई मुद्दे हमारे हर्बल उपचार का उपयोग करते हुए लगभग गायब हो जाते हैं। हमारे रोगियों को संक्रामक रोगों के कई लक्षणों से जैसे कि सिरदर्द होना, उल्टी व जी मिचलाना, बुख़ार आना, नाक बहना, लगातार छींके आना, गले में ख़राश, बदन दर्द, भूख में कमी, चक्कर आना, दस्त लगना, थकान व कमज़ोरी होना, मांसपेशियों में खिंचाव होना, बलगम वाली या सूखी खांसी आना, सांस लेने में तकलीफ होना, शरीर के अंगो का प्रभावित होना, वजन गिरना आदि से बहुत बड़ी राहत की अनुभूति होती है I हमारे इलाज से रोगी की प्रतिरक्षा प्रणाली में सुधार होता है जो संक्रामक रोग की अन्य जटिलताओं के लिए अनुकूल रूप से काम करता है I 

जीवन प्रत्याशा

अगर हम जीवन प्रत्याशा की बात करें तो गोमूत्र चिकित्सा अपने आप में एक बहुत बड़ी आशा है। कोई भी बीमारी, चाहे वह छोटे पैमाने पर हो या एक गंभीर चरण में, मानव शरीर पर नकारात्मक प्रभाव डालेगी और यह कई वर्षों तक मौजूद रहेगी, कभी-कभी जीवन भर भी। एक बार बीमारी की पहचान हो जाने के बाद, जीवन प्रत्याशा बहुत कम होने लगती है, लेकिन गोमूत्र चिकित्सा के साथ नहीं। हमारी प्राचीन चिकित्सा न केवल बीमारी से छुटकारा दिलाती है, बल्कि शरीर में किसी भी विषाक्त पदार्थों को छोड़े बिना व्यक्ति के जीवनकाल को बढ़ाती है और यह हमारा अंतिम लक्ष्य है।

दवा निर्भरता को कम करना

"सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत्", अर्थात सभी को हर्षित होने दें, सभी को रोग मुक्त होने दें, सभी को वास्तविकता देखने दें, किसी को कष्ट न होने दें। हम चाहते हैं कि इस कहावत को अपनाकर हमारी संस्कृति इसी तरह हो। हमारी चिकित्सा कुशल देखभाल प्रदान करके, प्रभावित रोगियों की जीवन प्रत्याशा को बढ़ाने और दवा निर्भरता को कम करके इसे पूरा करती है। इस नए युग में, हमारे उपचार में उपलब्ध किसी भी औषधीय समाधान की तुलना में अधिक लाभ और कम जोखिम हैं।

पुनरावृत्ति की संभावना को कम करना

व्यापक अभ्यास की तुलना में, हम रोग के अंतर्निहित कारण और कारणों पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो विशेष रूप से रोग के नियंत्रण पर निर्भर होने के बजाय रोग की पुनरावृत्ति की संभावना को बढ़ा सकते हैं। हम इस दृष्टिकोण को लागू करके और लोगों के जीवन को एक अलग रास्ता प्रदान करके प्रभावी रूप से पुनरावृत्ति की दर कम कर रहे हैं ताकि वे अपने जीवन को मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ तरीके से जी सकें।

संक्रामक रोग रोग के कारण

कई कारणो की वजह से व्यक्ति को संक्रामक रोग हो सकते है -

  1. सूक्ष्मजीव

संक्रामक रोगों के पनपने के सबसे मुख्य कारण सूक्ष्मजीव होते है जो व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर उन्हें संक्रमित करते है I ये सूक्ष्मजीव कई रूपों में मौजूद होते है जिनमें शामिल है -

  • वायरस : ये जीवाणु व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर स्वस्थ कोशिकाओं पर आक्रमण करते हैं और अपनी संख्या को दुगुना करते है I यह वायरस सामान्य सर्दी से लेकर एड्स तक कई बीमारियों का कारण बनते हैं।
  • बैक्टीरिया: यह रोगाणु छोटे, एकल-कोशिका वाले जीव होते है जो व्यक्ति के शरीर में रोग पैदा करने में सक्षम होते है I ये एक-कोशिका वाले जीव स्ट्रेप थ्रोट, मूत्र पथ के संक्रमण और तपेदिक जैसी बीमारियों के लिए ज़िम्मेदार होते है I 
  • कवक: इनमें कई अलग-अलग प्रकार के कवक शामिल होते हैं I कई त्वचा रोग, जैसे दाद और एथलीट फुट, इन कवक के कारण होते हैं। अन्य प्रकार के कवक व्यक्ति के फेफड़ों या तंत्रिका तंत्र को संक्रमित कर सकते हैं।
  • परजीवी: यह जीव मेजबान शरीर के अंदर रहते हैं जिससे बीमारी होती है I मलेरिया एक छोटे से परजीवी के कारण होता है जो मच्छर के काटने से फैलता है। अन्य परजीवी जानवरों के मल से मनुष्यों में संचरित हो सकते हैं।
  1. प्रत्यक्ष सम्पर्क

सबसे ज्यादा संक्रामक रोग व्यक्ति में प्रत्यक्ष संपर्क के माध्यम से फैलते है जिनमें शामिल है -

  • व्यक्ति से व्यक्ति में : कई मामलों में, किसी बीमार व्यक्ति के साथ सीधे संपर्क, या तो त्वचा से त्वचा के संपर्क, यौन संपर्क या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा छूने वाली किसी चीज को छूने से, रोग दूसरे व्यक्ति में संचारित हो जाता है I
  • पशु से व्यक्ति में: एक संक्रमित जानवर द्वारा काटे जाने या खरोंचने से या संक्रमित पालतू जानवर को छूने से, उनकी लार, बाल आदि से व्यक्ति बीमार हो सकता है और कुछ परिस्थितियों में यह उनके लिए घातक हो सकता है।
  • माँ से अजन्मे बच्चे को: एक गर्भवती महिला जब संक्रमित होती है तो वह अपने शरीर में मौजूद कीटाणुओं को अजन्मे बच्चे में पारित कर सकती है जो उसे संक्रमित करते है। कुछ रोगाणु प्लेसेंटा या स्तन के दूध से भी बच्चे में पहुँच सकते हैं।
  1. अप्रत्यक्ष सम्पर्क

कुछ मामलों में, संक्रामक रोग अप्रत्यक्ष संपर्क के माध्यम से व्यक्ति के शरीर में पहुँचते है जिसके पीछे निम्नलिखित कारक ज़िम्मेदार हो सकते है -

  • हवा द्वारा 

कई जीवाणु छोटे कणों में लंबे समय तक हवा में यात्रा करते हैं। स्वस्थ लोग इन कणों को अंदर लेते हैं और बाद में बीमार हो जाते हैं। केवल कुछ रोग वायुजनित संचरण से फैलते हैं, जिनमें तपेदिक और रूबेला वायरस शामिल हैं।

  • भोजन संदूषण

जब व्यक्ति दूषित पानी और भोजन का सेवन करते है तो उनमे मौजूद कीटाणु दूषित उन्हें संक्रमित कर सकते हैं। इस तरह का अप्रत्यक्ष सम्पर्क एक ही समय में कई लोगो को संक्रमित करता है I

  • कीड़े का काटना

कुछ रोगाणु मच्छर, पिस्सू, जूँ या टिक जैसे कीट वाहकों में मौजूद रहते है तथा जब ये कीट वाहक व्यक्ति की त्वचा को काटते है तो ये रोगाणु उनके शरीर में प्रवेश कर जाते है I इन कीट वाहकों को वैक्टर के रूप में जाना जाता है।


संक्रामक रोग रोग के निवारण

व्यक्ति यदि सावधानी बरतें तो काफी हद तक इन रोगों का शिकार होने से बच सकते हैं और इन्हें व्यक्ति दर व्यक्ति फैलने से रोक सकते है I जीवनशैली में कुछ जरुरी बदलावों को अपनाकर हम इने रोगों से स्वयं की सुरक्षा कर सकते है जिसके लिए कुछ उपायों को अपनाना जरुरी है -

  • हमे अपने भोजन में उन सभी पौष्टिक तत्वों को शामिल करना चाहिए जो हमारे शरीर को स्वस्थ व मजबूत बनाये रखने के लिए जरुरी है I
  • संक्रामक रोगों की जानकारी का अभाव हमे इनसे ग्रसित करता है अतः हमे इन रोगों से बचने के लिए उच्च व सही शिक्षा लेने की आवश्यकता है ताकि समय रहते हम इनसे निवारण हेतु उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ ले सके I
  • अशुद्ध पेयजल तथा दूषित भोजन वायरस, बैक्टीरिया जैसे रोगाणुओ को हमारे शरीर में मदद करते है अतः हमे स्वच्छ व सुरक्षित भोजन तथा पेयजल का सेवन करने पर खास ध्यान रखना चाहिए I
  • स्वयं के शरीर खासकर हाथों की स्वच्छता हमे इन संक्रामक रोगों से बचा सकती है I
  • समय समय पर इन रोगाणुओं से बचने के लिए लगाये जाने वाले टीके का स्वयं के साथ परिवार के प्रत्येक सदस्य को लगाये जाने पर हमे विशेष ध्यान देना चाहिए I 
  • संक्रमित व्यक्ति से निकटतम संपर्क हमे भी संक्रमित करता है इसलिए यदि कोई व्यक्ति किसी संक्रामक रोग से ग्रसित है तो उनके ठीक होने तक हमे उनसे तथा उनके द्वारा उपयोग की जाने वाली वस्तुओं से उचित दूरी बनाये रखनी चाहिए I
  • नित्य सैर, व्यायाम, योग तथा कसरत आदि गतिविधिया न सिर्फ हमारे शरीर को स्वस्थ रखने में सहायता करते है बल्कि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाते है I
  • पशुओं को पालने वाले व्यक्तियों को उन पशुओं का समय समय पर टीकाकरण करवाना चाहिए जिन पशुओं से रोगाणु मानव शरीर में फैलते है I
  • धूम्रपान, शराब तथा तम्बाकू आदि का अत्यधिक सेवन शरीर को कमज़ोर बनाते है इसलिए इन आदतों का व्यक्ति को पूरी तरह से त्याग करना चाहिए I

संक्रामक रोग रोग के लक्षण 

संक्रामक रोग के कई सामान्य लक्षण संक्रमित व्यक्ति में दिखाई देते है जिनमें शामिल है -

  • सिरदर्द होना
  • उल्टी व जी मिचलाना
  • बुख़ार आना 
  • नाक बहना
  • लगातार छींके आना  
  • गले में ख़राश
  • बदन दर्द
  • भूख में कमी
  • चक्कर आना
  • दस्त लगना
  • थकान व कमज़ोरी होना 
  • मांसपेशियों में खिंचाव होना
  • बलगम वाली या सूखी खांसी आना
  • सांस लेने में तकलीफ होना
  • शरीर के अंगो का प्रभावित होना
  • वजन गिरना


संक्रामक रोग के प्रकार

बीमारियों की एक बहुत बड़ी संख्या संक्रामक रोगों में आती है जिनमें शामिल है -

  • टॉयफाइड
  • मलेरिया
  • हैजा
  • डेंगू
  • एचआईवी/एड्स
  • कोलरा
  • इबोला वायरस डिजीज
  • मिडिल ईस्ट रेस्प‍िरेटरी सिंड्रोम
  • सवेयर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम
  • स्वाइन फ्लू
  • बर्ड फ्लू
  • चेचक
  • हेपेटाइटिस
  • इनफ्लुएंजा
  • कुष्ट रोग
  • खसरा
  • तानिकाशोथ
  • प्लेग
  • उपदंश
  • टेटनस
  • क्षय
  • पीत ज्वर
  •  रैबीज़
  • निमोनिया
  • स्कैबीज़

संक्रामक रोग की जटिलताएंँ

यदि कोई व्यक्ति संक्रामक रोग से ग्रसित होता है तो उन्हें कई सारी जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है जिनमें शामिल है -

  • कुछ गंभीर संक्रामक रोग व्यक्ति के लिए जानलेवा साबित हो सकते है I
  • कई संक्रामक रोग व्यक्ति के जरुरी अंगो को क्षतिग्रस्त कर सकते है I
  • इन रोगों की वजह से व्यक्ति का जीवन, शारीरिक तथा सामाजिक गतिविधियाँ बाधित होती है I
  • गंभीर संक्रामक रोग व्यक्ति के गुर्दे तथ दिल की विफलता का कारण बन सकते है I
  • कुछ प्रकार के संक्रमण जैसे कि ह्यूमन पेपिलोमावायरस, हेलिकोबैक्टर पाइलोरी, हेपेटाइटिस बी और सी कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के जोखिम को बढ़ने में मदद करते है I
  • कुछ संक्रामक रोग ठीक होने के बाद भविष्य में फिर से सक्रिय हो सकते है I
  • कुछ जानलेवा संक्रमणों के लिए व्यक्ति को अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता हो सकती है।

विभिन्न प्रकार के संक्रामक रोग

मान्यताएं