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पित्त की थैली का कैंसर का इलाज

अवलोकन

हमारे शरीर में स्थित लिवर के ठीक नीचे पित्त की थैली अर्थात पित्ताशय अंग एक गुब्बारे की आकृति में उपस्थित होता है l यह पित्ताशय मुख्यतः तीन परतो से घिरा हुआ होता है l पहली परत म्युकोजल कहलाती है l इस परत के ठीक ऊपर मस्कुलर परत होती है तथा सबसे ऊपर सिरोसा परत बनी होती है l पित्ताशय का प्रमुख कार्य लिवर में उत्पन्न होने वाले पित्त का संग्रह करना होता है l यह पित्त पाचन तरल पदार्थ होता है जिसे पित्ताशय भोजन करने के बाद उसे पचाने हेतु बाइल डक्ट की सहायता से हमारी छोटी आंत में प्रवाहित करता है और इस तरह से यह शरीर में भोजन को पचाने की क्रिया में सहायता करता है l 

जब किन्ही कारणवश पित्ताशय के ऊतकों में घातक तथा कैंसर जनित कोशिकाओं की उत्पत्ति होने लगती है तो उसे पित्ताशय अथवा पित्त की थैली का कैंसर कहा जाता है l यह कैंसर सबसे पहले पित्त की थैली की म्युकोजल परत में शुरू होता है जहां से यह मस्कुलर परत तथा सिरोसा परत में फैलते हुए लिवर तक पहुंच जाता है तथा दूसरे अंगो में फैलकर हमारे शरीर को अत्यधिक नुकसान पहुंचाता है l

अनुसंधान

जैन के गोमूत्र चिकित्सा क्लिनिक का उद्देश्य प्राचीन आयुर्वेदिक ज्ञान को आधुनिक तकनीक के साथ एकीकृत करके एक सुखी और स्वस्थ जीवन बनाना है। हमारी चिकित्सा का अर्थ है आयुर्वेद सहित गोमूत्र व्यक्ति के तीन दोषों पर काम करता है- वात, पित्त और कफ। ये त्रि-ऊर्जा हमारे स्वास्थ्य को बनाए रखती हैं, इन दोषों में कोई भी असंतुलन, मानव स्वास्थ्य और बीमारी के लिए जिम्मेदार है। हमें यह कहते हुए खुशी हो रही है कि हमारे उपचार के तहत हमने इतने सारे सकारात्मक परिणाम देखे हैं। हमारे इलाज के बाद हजारों लोगों को कई बीमारियों से छुटकारा मिला।

हमारे मरीज न केवल अपनी बीमारी को खत्म करते हैं बल्कि हमेशा के लिए एक रोग मुक्त स्वस्थ जीवन जीते हैं। यही कारण है कि लोग हमारी चिकित्सा की ओर ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। आयुर्वेदिक उपचारों में हमारे वर्षों के शोध ने हमें अपनी कार्यप्रणाली को आगे बढ़ाने में मदद की है। हम पूरी दुनिया में एक स्वस्थ और खुशहाल समाज का निर्माण करने के लिए अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने का लक्ष्य रखते हैं।

गोमूत्र चिकित्सा द्वारा प्रभावी उपचार

गोमूत्र चिकित्सीय दृष्टिकोण के अनुसार, कई जड़ी-बूटियां, शरीर के दोषों (वात, पित्त और कफ) को फिर से जीवंत करने का काम करती हैं, जो पित्त की थैली के कैंसर का कारण बनते हैं अगर वे अनुपातहीन हैं। कुछ आयुर्वेदिक दवाओं में, उनके उपचार के लिए कई लाभकारी तत्व होते हैं। यह शरीर के चयापचय को बढ़ाता है।

केमोट्रिम+ सिरप

हाइराइल + लिक्विड ओरल

टोक्सिनोल + लिक्विड ओरल

एन्सोक्योर + कैप्सूल

फोर्टेक्स पाक

प्रमुख जड़ी-बूटियाँ जो उपचार को अधिक प्रभावी बनाती हैं

कांचनार गुग्गुल

कोशिका (रोगाणुरोधी ) विभाजन और कोशिका प्रसार को कम करके, कांचनार गुग्गुल अपना साइटोटॉक्सिक प्रभाव प्रदर्शित करता है। यह औषधि कैंसर के उपचार के लिए सक्षम है तथा कैंसर ईलाज हेतु अपने पारंपरिक उपयोग को प्रेरित करते हैं।

सहजन

ज्यादातर कैंसर निरोध के लिए, सबसे प्रभावी सहजन एंटी-कैंसर हर्ब के साथ-साथ इसके घटक केम्पफेरोल और आइसो-क्वरसेटिन का उपयोग किया जाता है।

गिलोय

ग्लूकोसामाइन के साथ-साथ गिलोइन, गिलोइनिनल और बेरबेरीन में मौजूद अल्कोलाइड, गिलोय के गुण शरीर में सबसे अधिक कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करते हैं और रक्त और कोशिकाओं को स्वस्थ करते हैं।

अश्वगंधा

प्रतिक्रियाशील ऑक्सीजन श्रेणियां जो कैंसर कोशिकाओं का निर्माण करती हैं, अश्वगंधा के माध्यम से उत्पन्न होती हैं। विथफेरिन ए ट्यूमर पैदा करने वाली कोशिकाओं को मारने में प्रभावी है जो अश्वगंधा-स्थित यौगिक हैं।

कालमेघ

कालमेघ में कैंसर का इलाज करने के लिए एण्ड्रोग्राफ़ोलाइड नामक सबसे विशाल जीवंत तत्व है।

पुनर्नवा

पुर्ननाविन, एक कैंसर-रोधी दवा, एक अल्कलॉइड है जो अधिकांश कैंसर कोशिकाओं के विकास को रोकता है, यह कैंसर को रोकने का एक स्वस्थ और सरल तरीका है।

आमला

आंवला में एंटीऑक्सीडेंट की एक शानदार मात्रा के साथ विटामिन सी, ई, बीटा-कैरोटीन और कैरोटीनॉयड है जो कार्सिनोजेनिक वृद्धि को रोकती है।

पिप्पली

पिप्पली के तत्व पाइपरलोंग्यूमाइन (PL) में मौजूद एक रासायनिक यौगिक ज्यादातर कैंसर कोशिकाओं को रोकता है और एक ट्यूमर एंजाइम को उस तक पहुंचने से रोकने में मदद करता है।

भृंगराज

यह एक मजबूत जड़ी बूटी है जो शरीर के अंदर तक कैंसर कोशिकाओं के प्रसार को रोकता है। इसमें मौजूद प्राकृतिक अणु, डीएनए अणुओं के अधिकांश कैंसर कोशिकाओं में वृद्धि को रोकते हैं।

तुलसी

तुलसी के पत्तों में एक तत्व होता है, जिसे यूजेनॉल कहा जाता है, जो कैंसर की कोशिकाओं से रक्षा करने के लिए बहुत उच्च गुणवत्ता का होता है।

नीम

नीम की पत्ती की एंटीऑक्सीडेंट और एंटी कार्सिनोजेनिक गुण के रूप में नीम घन सत् जैसे विशाल नीम तत्व काम करते हैं जो किसी व्यक्ति के कैंसर कोशिकाओं को मारने में सहायक होते हैं।

सोंठ

सोंठ में शोगोल, हर्बल भोजन का एक हिस्सा है जो कई फेनोलिक यौगिकों के साथ जिंजरोल को वहन करता है जिनमें कैंसर विरोधी और एंटीऑक्सीडेंट प्रभाव होता है।

बहेड़ा

बहेड़ा में रखा गया एक उच्च पॉलीफेनोल वाला गैलिक एसिड, सबसे शक्तिशाली साइटोटोक्सिसिटी कारक है जो ट्यूमर कोशिकाओं में साइटोटॉक्सिसिटी (कोशिका-मृत्यु) को बढ़ावा देता है।

चित्रक

कैंसर कोशिकाओं से बचने के लिए, प्लंबगिन की भारी मात्रा का, इस जड़ी बूटी के कैंसर-रोधी एजेंट के रूप में उपयोग किया जाता है।

कुटकी

पिक्रोसाइड्स कुटकी का एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट तत्व है जिसका उपयोग कैंसर के इलाज के लिए और कैंसर ट्यूमर को दबाने के लिए एक प्रमुख तंत्र के रूप में किया जाता है।

कंघी

पॉलीफेनोलिक यौगिकों का उपयोग कंघी में एक प्रभावी रूप से कई गुना लाभदायक तरीके से किया जाता है जो कैंसर कोशिकाओं को प्रभावित करता है।

हल्दी

हल्दी में एक करक्यूमिन रासायनिक यौगिक होता है जो हल्दी में प्रभावी रूप से पाया जाता है। यह अधिकांश कैंसर कोशिकाओं का मुकाबला कर सकता है और बढ़ती हुई अधिकतम कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने में मदद कर सकता है।

गूलर छाल

इसमें साइटोटॉक्सिसिटी और कैंसर विरोधी हर गतिविधि होती है। फाइटोकेमिकल तत्वों के एकमात्र या अधिक अर्क सेल विकास को बाधित करने के लिए तथा मनुष्यों में कैंसर के अवरोधन के लिए एक संभावित एंटी कैंसर यौगिक है।

सहदेवी

सहदेवी के अधिक से अधिक कैंसर उपचारों में सिडा एक्यूटा, सिडा कॉर्डिफोलिया, सिडा रंबिफोलिया और यूरेना लोबाटा जैसे गुणों का दृढ़ता से उपयोग किया जाता है।

शिलाजीत

न्यूरोप्रोटेक्टिव शिलाजीत का एक विशेष रूप है जो शरीर की पूर्ण कैंसर कोशिका की तीक्ष्णता से लड़ने के लिए कारगर है जो सूक्ष्मता से इसे रोकने का कार्य करता है I

आंवला हरा

इसके फाइटोकेमिकल्स (गैलिक एसिड, पेंटाग्लॉइगलग्लूकोज, एलाजिक एसिड, पायरोगॉल, क्वेरसेटिन और केम्प फेरोल) के बड़े हिस्से को नियोप्लास्टिक कोशिकाओं के लिए साइटोक्सॉक्सिक माना जाता है जिसके कई तंत्र कैंसर की रोकथाम के लिए जिम्मेदार होते हैं।

शतावरी

रेसमोफ्यूरन, जो शतावरी का प्रभावी तत्व है, ट्यूमर की आवृत्ति को रोकता है और अपने कैंसर विरोधी घटक के कारण अधिकांश कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करता है।

घी

घी में मौजूद एक एंटीऑक्सीडेंट एक मजबूत यौगिक है जिसे संयुग्मित लिनोलिक एसिड (सीएलए) के रूप में जाना जाता है। यह प्रभावी एंटी कैंसर तत्व कोशिकाओं को आत्म-विनाश (एपोप्टोसिस के रूप में मान्यता प्राप्त एक विधि) के लिए प्रेरित करता है I

गोखरू

गोखरू में अल्कोइड्स को नोहरमैन व हरमन के रूप में पहचाना जाता है जो ऐसे कारक जो संभवतः सर्वोत्कृष्ट माने जाते हैं। इसके अलावा, इसमें स्टेरॉइडल सैपोनिन होते हैं जिन्हें टेरेस्ट्रोसिन ए-ई, फ्लेवोनोइड ग्लाइकोसाइड्स और फ़्यूरोस्टोनोल एंटी-कैंसर तत्वों के रूप में संदर्भित किया जाता है।

मुलेठी

बीसीएल -2 की मात्रा कम करने के माध्यम से, एक दवा प्रतिरोधी प्रोटीन, मुलेठी जड़ से प्राप्त पदार्थ, लाइसोक्लेकोन-ए, को अधिकांश कैंसर कोशिकाओं के उपभेदों में एंटीट्यूमर माना जाता है।

गोजला

हम अपने गोमूत्र चिकित्सा में गोजला का उपयोग करते हैं, मूल रूप से इसका मतलब है कि हमारी दवा में मुख्य घटक गोमूत्र अर्क है। यह अर्क गाय की देसी नस्लों के मूत्र से बना है। गोजला के अपने फायदे हैं क्योंकि यह किसी भी प्रकार के संदूषण की संभावना से परे है। इसकी गुणवत्ता उच्च है एवं प्रचुर मात्रा में है। जब गोजला आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों के साथ मिलाया जाता है तो यह किसी भी बीमारी के इलाज के लिए अधिक प्रभावी हो जाता है और विशेष बीमारियों में अनुकूल परिणाम देता है। इस अर्क का अत्यधिक परीक्षण किया गया है और इसलिए यह अधिक विश्वसनीय और लाभदायक भी है।

जीवन की गुणवत्ता

गोमूत्र के उपचार से उपयुक्त स्वास्थ्य मिलता है और एक क्रम में शरीर के दोषों में संतुलन बनाए रखता है। इन दिनों हमारे उपचार के परिणामस्वरूप लोग अपने स्वास्थ्य को लगातार सुधार रहे हैं। यह उनके रोजमर्रा के जीवन-गुणवत्ता में सुधार करता है। गोमूत्र के साथ-साथ आयुर्वेदिक दवा का उपचार विभिन्न उपचारों के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए पूरक थेरेपी के रूप में कार्य कर सकते हैं जो भारी खुराक, बौद्धिक तनाव, विकिरण और कीमोथेरेपी के उपयोग से आते हैं। हम लोगों का मार्गदर्शन करते हैं, एक सुखी और तनाव मुक्त जीवन जीने का एक तरीका सिखाते है, यदि उन्हें कोई असाध्य बीमारी है तो। हमारे उपाय करने के बाद हजारों मनुष्य एक संतुलित जीवन जीते हैं और यह हमारे लिए एक बड़ी उपलब्धि है कि हम उन्हें एक जीवनशैली दें जो वे अपने  सपने में देखते हैं।

जटिलता निवारण

गोमूत्र, जिसे अक्सर पित्त की थैली का कैंसर जैसी भयानक बीमारियों के लिए अच्छा माना जाता है, का आयुर्वेद में विशेष स्थान है। हमारे वर्षों के काम से साबित होता है कि हमारी आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों के साथ  पित्त की थैली का कैंसर के कुछ लक्षण लगभग गायब हो जाते हैं। हमारे मरीज शरीर में दर्द, नियंत्रण और हार्मोनल और रासायनिक परिवर्तनों में एक बड़ी राहत महसूस करते हैं, शरीर के अन्य अंगों या आस-पास फैलने वाली कैंसर कोशिकाओं की गति को धीमा करते हैं, रोगी की प्रतिरक्षा प्रणाली में सुधार करते हैं जो अन्य कैंसर जटिलताओं के लिए अनुकूल रूप से काम करता है तथा मस्तिष्क नियंत्रण और तंत्रिका तंत्र से संबंधित समस्याओं को भी दूर करता है I

जीवन प्रत्याशा

यदि हम किसी व्यक्ति की अस्तित्व प्रत्याशा के बारे में बात कर रहे हैं तो गोमूत्र उपाय स्वयं में एक बड़ी आशा हैं। कोई भी बीमारी या तो छोटी या गंभीर स्थिति में होती है, जो मानव शरीर पर बुरा प्रभाव डालती है और कुछ वर्षों तक मौजूद रहती है, कभी-कभी जीवन भर के लिए। एक बार विकार की पहचान हो जाने के बाद, अस्तित्व प्रत्याशा कम होने लगती  है, लेकिन गोमूत्र चिकित्सा के साथ नहीं। हमारा ऐतिहासिक उपाय अब इस बीमारी से सबसे प्रभावी रूप से ही छुटकारा नहीं दिलाता है, बल्कि उस व्यक्ति की जीवनशैली-अवधि में भी वृद्धि करता है और उसके रक्तप्रवाह में कोई विष भी नहीं छोड़ता है और यही हमारा अंतिम उद्देश्य है।

दवा निर्भरता को कम करना

"सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत्", इसका अर्थ है सभी को हर्षित होने दें, सभी को बीमारी से मुक्त होने दें, सभी को वास्तविकता देखने दें, कोई भी संघर्ष ना करे। इस आदर्श वाक्य के पालन के माध्यम से हमें अपने समाज को इसी तरह बनाना है। हमारा उपचार विश्वसनीय उपाय देने, जीवन प्रत्याशा में सुधार और प्रभावित लोगों की दवा निर्भरता कम करने के माध्यम से इसे पूरा करता है। इस समकालीन समाज में, हमारे उपाय में किसी भी मौजूदा औषधीय समाधानों की तुलना में अधिक लाभ और कमियां बहुत कम हैं।

पुनरावृत्ति की संभावना को कम करना

व्यापक चिकित्सा अभ्यास के विपरीत, हम रोग और तत्वों के मूल उद्देश्य पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो इस पद्धति का उपयोग करके केवल बीमारी के प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय बीमारी की पुनरावृत्ति की संभावनाओं में सुधार कर सकते हैं, हम कुशलता से पुनरावृत्ति दर को कम रहे हैं और मानव जीवन के लिए एक नया रास्ता दे रहे हैं , जो कि उन्हें भावनात्मक और शारीरिक रूप से उनके जीवन को बेहतर तरीके से जीने का एक तरीका बताते है।

पित्त की थैली में कैंसर के कारण 

पित्त की थैली में होने वाले कैंसर के कई कारण तथा जोखिम कारक जिम्मेदार हो सकते हैं - 

  • क्रोनिक सूजन तथा संक्रमण 

यदि किसी व्यक्ति की पित्त की थैली में एक लम्बे समय से सूजन रहती है तो उस अंग में संक्रमण होने की आशंका बनी रहती है जो कि पित्त की थैली के कैंसर का कारण बन सकते हैं l व्यक्ति की पित्त की थैली में सूजन उसमें बार बार होने वाली पथरी के कारण भी आ सकती है जिसकी प्रक्रिया दीर्घकालीन समय तक चलते रहने की वजह से पित्त की थैली संक्रमित होने लगती है तथा इस तरह का कैंसर उत्पन्न होने लगता है l

  • पित्त की थैली में पथरी 

जब पित्ताशय की थैली में कोलेस्ट्रॉल, कैल्शियम कार्बोनेट, कैल्शियम बिलीरूबीनेट जैसे केमिकल असंतुलित हो जाते हैं तब पित्ताशय में पथरी का निर्माण होने लगता है l यह पथरी पत्थर समान पदार्थ होते हैं जो पित्त नलिकाओं का मार्ग अवरुद्ध करने लगते हैं l जिसके कारण पित्ताशय में सूजन और संक्रमण होने लगते हैं l लंबे समय तक तथा बार बार होने वाली पथरी की समस्या पित्ताशय के कैंसर को बढ़ावा देती है l 

  • परिवारिक इतिहास 

परिवार में यदि किसी सदस्य का पित्ताशय के कैंसर का इतिहास रहा हो अथवा यदि कोई सदस्य पित्ताशय के कैंसर से पीड़ित रहा हो तो संभव है कि दूसरे सदस्यों को भी यह कैंसर आनुवंशिकी के कारण हो l

  • डीएनए उत्परिवर्तन 

जब व्यक्ति की पित्त की थैली की सामान्य कोशिकाओं के डीएनए में उत्परिवर्तन होने लगता है तो यह कोशिकाएं अत्यधिक सक्रिय होने लग जाती है जिससे कोशिकाएं अनियंत्रित हो जाती है तथा एकत्रित होकर पित्ताशय में ट्यूमर का निर्माण करने लगती है और फिर इस तरह के कैंसर की उत्पत्ति की संभावनाएं बढ़ने लगती है l

  • मोटापा 

प्रायः शरीर का जरूरत से अधिक वजन पित्ताशय के कैंसर के जोखिम बढ़ा सकता है l व्यक्ति के मोटापे की वजह से शरीर में अत्यधिक फैट पित्त की थैली में कोलेस्ट्रॉल, कैल्शियम कार्बोनेट, कैल्शियम बिलीरूबीनेट जैसे केमिकल को असंतुलित करता है जो पथरी की बीमारियों को आकर्षित करते है तथा पित्ताशय के कैंसर के खतरे का कारण बनते हैं l 

  • अग्नाशय तथा पित्त नलिकाओं की असामान्यताएं 

अग्नाशय भी पित्ताशय के समान ही पाचन क्रिया हेतु छोटी आंत मे एक वाहिनी द्वारा तरल पदार्थ भेजता है l यह वाहिनी पित्त नलिकाओं के साथ मिली होती है l जब किसी कारण से अग्नाशय का तरल पदार्थ पित्त नलिकाओं में प्रवाहित होने लगता है तो पित्ताशय द्वारा प्रवाहित होने वाला पित्त इन पदार्थों द्वारा क्षतिग्रस्त होने लगता है जो पित्त की थैली के कैंसर के खतरे को बढ़ा सकते हैं l
 

पित्त की थैली के कैंसर का निवारण 

अपने जीवन में कई सही तरीके और स्वस्थ आदतें अपनाकर हम पित्त की थैली के कैंसर के जोखिमों को कम कर सकते हैं - 

  • पर्याप्त और नियमित व्यायाम व्यक्ति के स्वास्थ्य के साथ उसके पित्ताशय को भी स्वस्थ बनाए रखता है जिससे व्यक्ति की पाचन क्रियाएं निर्बाध गति से चलती रहती हैं l
  • व्यक्ति को समृद्ध भोजन, पौष्टिकता से भरपूर तथा संतुलित आहार लेना चाहिए l
  • व्यक्ति को अपना वजन संतुलित रखना चाहिए तथा जरूरत से ज्यादा वजन बढ़ने से रोकना चाहिये l
  • धूम्रपान तथा एल्कोहल के अत्यधिक सेवन से व्यक्ति को बचना चाहिए l
  • व्यक्ति को बार बार होने वाली पथरी की समस्या का सही उपचार कराया जाना चाहिए ताकि उसे पित्ताशय में होने वाली सूजन तथा संक्रमण को रोका जा सके l

पित्त की थैली के कैंसर के लक्षण 

पित्त की थैली में होने वाले कैंसर के लक्षण इस प्रकार है -

  • व्यक्ति के पेट में दर्द होने लगता है विशेषतः पेट के ऊपरी दाएँ भाग के हिस्से में l
  • व्यक्ति के पेट में गांठ की समस्या उत्पन्न होने लगती है l 
  • इस कैंसर से पीड़ित व्यक्ति के पेट में सूजन होने लगती है तथा पेट फूलने लगता है l
  • व्यक्ति को ज्यादा भूख नहीं लगती तथा अनायास ही उसका वजन कम होने लगता है l
  • व्यक्ति की त्वचा पीली दिखाई देती है तथा पेशाब में पीलापन आने लगता है जो कि पीलिया के लक्षणों को दर्शाते हैं l
  • व्यक्ति को बिना किसी वजह से बुखार आने लगता है तथा उसे ठंड लगने लगती है l
  • व्यक्ति का जी मिचलाने लगता है तथा उसे उल्टियां होने लगती है l

 

पित्त की थैली के कैंसर के प्रकार 

पित्त की थैली का कैंसर कई प्रकार का होता है जो कि निम्नलिखित है

  • एडेनोकार्सिनोमा

पित्त की थैली के कैंसर का यह सबसे आम प्रकार है जो लोगों में अधिकतर देखने को मिलता है l एडेनोकार्सिनोमा से अभिप्राय ग्रंथि कैंसर से है l पित्ताशय की ग्रंथि कोशिकाएं जब अनियंत्रित रूप से विकसित होती है तो इनसे बनने वाले ट्यूमर कैंसर का रूप ले लेते हैं l आम तौर पर इन ग्रंथि कोशिकाओं का कार्य बलगम का निर्माण करना होता है l एडेनोकार्सिनोमा के भी उप प्रकार होते है जो कि निम्नलिखित है - 

पेपीलरी एडेनोकार्सिनोमा 

जब ट्यूमर की घातक कोशिकाएं जटिल पेपिलरी संरचनाओं का निर्माण करती हैं और सामान्य पित्ताशय की थैली की जगह लेती है, जो संकुचित, विनाशकारी विकास को प्रदर्शित करती है। पैपिलरी एडेनोकार्सिनोमा उन ऊतकों में विकसित होते हैं जो पित्ताशय की थैली को पकड़ते हैं (संयोजी ऊतक)। इस तरह के पित्ताशय की थैली के कैंसर के यकृत और पास के लिम्फ नोड्स में फैलने की संभावना कम होती है। यह पित्ताशय की थैली के कैंसर के अन्य प्रकारों की तुलना में बेहतर दृष्टिकोण रखता है।

म्यूसिनस एडेनोकार्सिनोमा 

म्यूसिनस एडेनोकार्सिनोमा के साथ, कैंसर कोशिकाएं अक्सर बलगम के पूल में होती हैं।

  • स्क्वैमस सेल कैंसर 

स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा नामक यह कैंसर पित्त की थैली बनाने वाली परत तथा ग्रंथि कोशिकाओं की त्वचा समान कोशिकाओं के असामान्य रूप से विकसित होने की वजह से होता है l इस तरह के कैंसर के मामले प्रायः लोगों में बहुत ही कम देखने को मिलते हैं l 

  • एडेनोस्क्वैमस कैंसर

यह कैंसर स्क्वैमस सेल कैंसर तथा एडेनोकार्सिनोमा का मिश्रित रूप होता है l अर्थात एडेनोस्क्वैमस कार्सिनोमा में ग्रंथियों संबंधी और स्क्वैमस सेल दोनों प्रकार के कैंसर की कोशिकाएं होती हैं।

  • स्माल सेल कैंसर

कैंसर जोकि बहुत ही छोटी जई (ओट) जैसी दिखने वाली कोशिकाओं में शुरू होता है स्माल सेल कैंसर कहलाता जिसे ओट सेल कैंसर के नाम से भी जाना जाता है l

  • सारकोमा 

सारकोमा पित्त की थैली के कैंसर का वह प्रकार है जिसकी उत्पत्ति पित्त की थैली की मांसपेशियों की परत में होती है l यह कैंसर रक्त वाहिकाओं, मांसपेशियों तथा नसों जैसी संयोजी ऊतकों को प्रभावित करता है l यह संयोजी ऊतक हमारे शरीर को बचाने हेतु सहायक के रूप में कार्य करती है l सारकोमा इन ऊतकों को क्षतिग्रस्त करता है l 

  • न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर

न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर पाचन प्रणाली में ऊतकों का निर्माण करने वाले हार्मोन में विकसित होते हैं l इस कैंसर को कार्सिनोइड के नाम से भी जाना जाता है तथा यह एक बहुत ही दुर्लभ प्रकार का कैंसर होता है l 

  • लिम्फोमा और मेलेनोमा

लिम्फोमा पित्त की थैली के कैंसर का उस प्रकार का कैंसर है जिसकी शुरुआत लिम्फोसाइट्स नाम की कोशिकाओं से होती है ये कोशिकाएं हमारे लिम्फ नोड्स व कई दूसरे हिस्सों में होती है। लिम्फोमा की स्थिति होने पर लिम्फोसाइट्स तेजी से बदलने लगते हैं और अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगते हैं।

पित्त की थैली के कैंसर का एक प्रकार जो मेलेनोसाइट्स कोशिकाओं में शुरू होता है वह कैंसर मेलेनोमा कहलाता है। प्रायः इस तरह के कैंसर बेहद दुर्लभ होते हैं तथा लोगों में इस तरह के कैंसर होने के अवसर बहुत ही कम होते हैं l

पित्त की थैली के कैंसर के चरण

पित्त की थैली के कैंसर के निम्नलिखित चरण होते हैं - 

  • पहला चरण : पहले चरण में यह कैंसर पित्त की थैली पहली परत म्युकोजल तक ही सीमित रहता है I
  • दूसरा चरण : दूसरे चरण में यह कैंसर पित्त की थैली की बाहरी परतों मस्कुलर तथा सिरोसा में फैलने लगता है I
  • तीसरा चरण : यह कैंसर अपने तीसरे चरण में अपने आसपास के एक या एक से अधिक अंगों जैसे लिवर, छोटी आंत तथा पेट आदि में फैलने लगता है I
  • चौथा चरण :अपने अंतिम चरण में पित्त की थैली का यह कैंसर लिम्फ नोड्स में फैल जाता है तथा शरीर के दूसरे अंगों तक पहुँच जाता है I

 

पित्त की थैली के कैंसर की जटिलताएं

इस तरह के कैंसर से व्यक्ति को कुछ जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है जैसे कि -

  • इस कैंसर से पीड़ित व्यक्ति के पेट की मांसपेशियों में वृद्धि होने लगती है l
  • यह कैंसर व्यक्ति के लीवर के कार्यो को भी बाधित करता है जिससे व्यक्ति का लीवर ख़राब होने की सम्भावना बनी रहती है I
  • व्यक्ति को तीव्र कोलीकस्टीटीस की शिकायत रहने लगती है जो एक प्रकार की पित्त की थैली की सूजन होती है l
  • व्यक्ति को दस्त, कब्ज जैसी पाचन संबंधी समस्याएं रहने लगती है l

मान्यताएं